अंशावतारी -गुरु


अंशावतारी परमप्रभु परमेश्वर के प्रकाशदूत अथवा प्रकाश सन्देश वाहक के रूप में भू-मण्डल पर आते हैं तो वे (अंशावतारी) जब किसी से बात करते हैं अथवा जब प्रवचन करते हैं अथवा वह जब कोई ग्रन्थ लिखते हैं अथवा जब उनके उपदेशों पर कोई ग्रन्थ लिखा जाता है तो बोली-बचन और बाह्य उपदेश-लेखन तो परमप्रभु परमेश्वर के पूर्णावतार जैसा ही तत्त्व-परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप अद्वैत्तत्त्वम् आदि-आदि शब्द नाम-नामित परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान को ही जानने-देखने-पाने (प्राप्त करने) की बात करते-रहते हैं, मगर जब भक्तजन-अनुयायीजन उनके कथन-प्रवचनों से उत्प्रेरित-आकर्षित होकर उनसे तत्त्वज्ञान पाने को जब आगे बढ़ते हैं, तब पता चलता है कि वर्णन तो वे सब कुछ क्रमश: परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप अद्वैत्तत्त्वम् अनाम-अरूप का और तत्त्वज्ञान का वर्णन करते-कराते चलते हैं तो इसी को आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-स्पिरिट-दिव्य ज्योति-स्वयं ज्योति रूप शिव-सहज प्रकाश-परम प्रकाश-सोऽहँ- ह्ँसो-ज्योतिर्मय स: भी और योग-साधना-अध्यात्म नाम-रूप में भी वर्णन करने- कराने लगते हैं । पुन: इसी को ही जीव-रूह-सेल्फ-स्व-अहं (अहं ब्रह्मास्मि) और स्वाध्याय के रूप में भी वर्णन करने लगते हैं। पुन:-पुन: जब आगे वर्णन करते-चलते है तो इसी परमात्मा-परमेश्वर और तत्त्वज्ञान को ही आत्मा-ईश्वर और योग-अध्यात्म को ही जीव-रूह-सेल्फ-स्व-अहं भी -और स्वाध्याय को ही महावाक्य जैसे--'अयं आत्मा ब्रम्ह, ज्ञानं अनन्तं ब्रम्ह, प्रज्ञानं ब्रम्ह, सत्यं अनन्तं ब्रम्ह, सर्वं खल्विदं ब्रम्ह, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि आदि-आदि कह-कहकर वर्णन करने लगते हैं ।
अंशावतारियों की स्थिति जैसा कि उपर्युक्त पैरा में वर्णित है, ऐसी होती है जैसी कि इनको स्पष्टत: जानकारी किसी की भी नहीं होती, मगर वर्णन ये सभी का ही करते हैं । अर्थात् प्रवचन, उपदेश तो ये सभी को ही एक ही कहते हुए और सभी का ही घमंजा (मिश्रण-खिचड़ी) बनाते हुए ऐसा वर्णन करते हैं कि वास्तविक तत्त्वज्ञान की यथार्थत: जानकारी और स्पष्टत: साक्षात् दर्शन किये हुए बगैर इनके प्रवचनों-उपदेशों-ग्रन्थों में जो कोई भी प्रवेश करेगा, नि:सन्देह वह भरम-भटकाव का शिकार होगा । भरम-भटकाव का शिकार होगा ही । परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान् तथा इनकी प्राप्ति-परिचय-पहचान वाला तत्त्वज्ञान और मुक्ति-अमरता रूप मोक्ष की प्राप्ति इनसे बिल्कुल ही असंभव रही है और है भी।

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