तपस्वी-त्यागी-सन्यासी

() तपस्वी

'तप' शब्द का शाब्दिक अर्थ है तपना यानी कष्ट सहन करना । सत्य के लिये अथवा परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान के लिए अथवा धर्म की राह पर रहने-चलने पर जो कुछ भी कष्ट-परेशानियाँ आती हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अथवा सहजभाव में सहन करते हुए प्रसन्न मुद्रा में धर्म-पथ पर बने रहना 'तप' कहलाता है । जबकि यही सब स्थिति शारीरिक-पारिवारिक स्थिति-परिस्थिति में होती है तो उसे 'आपदा-विपदा' कहते हैं क्योंकि यह शरीर और परिवार को कष्टकर, अतिकष्टकर बना देती है-- कंगाल बना देती है--विपदाग्रस्त बना देती है जिससे आदमी टूट जाता है और प्राय: अधिकतर व्यक्ति नाना प्रकार की विकृतियों के शिकार हो जाया करते हैं जबकि ऐसी प्रतिकूल स्थितियाँ-परिस्थितियाँ तपस्वी को आगे बढ़ने हेतु दृढ़ता प्रदान करती हैं--साहस प्रदान करती हैं । अपने तप के मार्ग में--सत्य के मार्ग में--भगवद् मार्ग में--धर्म के मार्ग में आगे बढ़ने हेतु उत्प्रेरण और बल प्रदान करती हैं। इतना ही नहीं, जितनी ही कठोर-घनघोर प्रतिकूल परिस्थितियाँ तप करने वाले तपस्वियों के सामने आती हैं और दृढ़तापूर्वक वे पार करते जाते हैं तब वे उतने ही बड़े-बड़े और महान तपस्वी कहलाने लगते हैं जबकि ऐसे ही प्रतिकूल स्थितियों-परिस्थितियों के आने पर गृहस्थ आपदा-विपदा ग्रस्त, कंगाल, बेचारा, सर्वत्र अपमानित, त्याज्य जैसे घृणास्पद और उपेक्षात्मक रूप में समाज में देखा जाने लगता है । यह स्थिति है पारिवारिक- सांसारिक की जबकि तपस्वी ठीक इसके प्रतिकूल आदरणीय सम्मानित, प्रतिष्ठित रूप में तो देखा ही जाता है, अधिकतर समाज तो उसे पूजनीय रूप में भी स्वीकार करने लगता है ।
आप सब देखिए कि 'सत्य' की राह में--भगवद् राह में--धर्मतत्त्व की प्राप्ति की राह-खोज में ही अभी यह मर्यादा है तो प्राप्ति करके रहने-चलने वाले भक्त और ज्ञानीजन की क्या महत्ता होगी ?
वास्तव में 'तप' की वास्तविक स्थिति यह है कि 'तप' का अर्थ वास्तव में 'खोज' होता है यानी 'सत्य' की खोज । परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान की खोज । वास्तविक धर्मतत्त्व की खोज । ऐसी खोज कि जिसमें जितने ही कष्टमय प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं, उससे उतनी ही दृढ़ता और प्रसन्नता के साथ सहिष्णुता भी बढ़ती-रहती है । ऐसी ही स्थिति-परिस्थिति का वास्तविक नाम 'तप' है और इससे गुजरने वाला 'तपस्वी' कहलाता है ।
भौतिक समाज में इनकी बड़ी महत्ता होती है क्योंकि जिन कमी-परेशानियों-कष्टों को ले-ले कर अथवा जिन प्रतिकूल परिस्थितियों से गृहस्थ समाज कंगाल, कष्टी, विपत्तिहा (आपत्ति-विपत्ति से ग्रसित) कहलाते हुए अपनी सहज पारिवारिक स्थिति में भी टूट सा जाया करता है । टूटकर अधिकतर तो नाना प्रकार की विकृतियों को अपना लिया करते हैं। इसलिए उन परिस्थितियों की पकड़ गृहस्थ जनमानस को सहज ही हो जाया करती है और उन्हीं परिस्थितियों में जिसमें कि गृहस्थ समाज की उपर्युक्त स्थिति हो जाया करती है, उन्हीं विपरीत-प्रतिकूल स्थिति-परिस्थितियों में गृहस्थ समाज जब तपस्वी को प्रसन्नता पूर्वक साहसिक रूप में दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते देखता है; तब उन्हें सहज ही भासने लगता है कि 'सत्य' की क्षमता-शक्ति--भगवान की कृपा रूपी क्षमता-शक्ति अथवा धर्मतत्त्व की ऋध्दियाँ-सिध्दियाँ रूपी शक्तियाँ इस व्यक्ति (तपस्वी) की रक्षा-व्यवस्था में साथ हैं अर्थात् यह व्यक्ति सिध्द भगवत् कृपा प्राप्त तपस्वी है--तपोनिष्ठ है । इस प्रकार की उपाधियों से विभूषित करने लगते हैं ।

'तप' एक ऐसा सहिष्णुता (सहनशीलता) का विधान है कि यह किसी 'तपस्वी' को धार्मिक होने का भगवत् खोजी--भक्त होने का धर्म सिध्द होने की सहज ही मान्यता प्रदान करा देता है । शंका-संदेह तो शंका-संदेह है, सोचने-विचारने की भी गुंजाइश नहीं रहने देता । सीधो ही और सहज ही धार्मिक मान्यता प्रदान करा देता है । 'तप' तपस्वी के प्रति जनमानस को भाव में ऐसा बहा देता है कि लगता है कि धर्म की वास्तविक स्थिति यही है । सबसे बड़ा ध्यानी-ज्ञानी-सन्त-महात्मा 'तपस्वी' यही हैं जबकि वास्तविक सच्चाई इससे हटकर कुछ भिन्न ही होती है और वह यह है कि 'तप' धर्म रूपी महल की मोक्ष रूपी अन्तिम मंजिल न होकर पहली सोपान है- पहली सीढ़ी है ।

धर्म में 'तप' की वास्तविक स्थिति:--अब यहाँ पर प्रश्न यह उठ सकता है कि इतनी कठिनाई और कठोरता से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी साहस और दृढ़ता से गुजरने वाला 'तप' धर्म के अन्तर्गत पहली सोपान--पहली सीढ़ी मात्र ही क्यों ?

सारा ब्रह्माण्ड वास्तव में चार श्रेणियों में विभक्त रहते हुए संयुक्त रूप में स्थित है जैसे--
1  . संसार और शरीर के मध्य शरीर तक की श्रेणी यानी स्थूल श्रेणी;
2 . शरीर-जिस्म-बॉडी और जीव-रूह-सेल्फ के मध्य जीव-रूह-सेल्फ तक की श्रेणी यानी सूक्ष्म श्रेणी;
3 . जीव-रूह-सेल्फ-स्व-अहं और आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-स्पिरिट-दिव्य ज्योति-ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव के मध्य आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-स्पिरिट-दिव्य ज्योति-ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव तक की श्रेणी यानी कारण श्रेणी और
4 . आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-स्पिरिट-दिव्य ज्योति-ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव और परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप अलम्-गॉड रूप परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान के मध्य परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड- भगवान तक परम और सम्पूर्ण की श्रेणी यानी परम कारण (महाकारण) की श्रेणी --- ये चार श्रेणियाँ ही

धर्म में चार सोपान--चार चरण (1. स्थूल 2. सूक्ष्म 3. कारण  4.परमकारण) कहलाते  हैं।
'तप' उपर्युक्त चार श्रेणियों में से नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली पहली श्रेणी यानी शरीर से कहने मात्र भर के सत्य या धर्म के लिये और शरीर तक का सीमित विधान है । क्योंकि 'तप' सांसारिकता के अन्तर्गत सांसारिक त्याग मिश्रित सहिष्णुता (कष्ट सहन) मात्र वाला विधान है । यह बात सही है कि तप में भावना सत्य की प्राप्ति की--भगवत् प्राप्ति की -- धर्मतत्त्व की प्राप्ति की ही होती है, मगर विधान (कर्म-क्रिया) शरीर तक ही सीमित होता है । इसमें जो कुछ भी कर्म-क्रिया की जाती है, जाने-अनजाने जिद्द-हठ और अहंकार को जन्म देता है  जो (अहंकार) इसका स्वाभाविक लक्षण होने के कारण ज्ञानवानों की दृष्टि में धर्म में वास्तविक स्थिति मान्यता तप को कोई महत्त्वपूर्ण लक्षण स्थान नहीं मिल पाया ।
'तप' में 'तत्त्वज्ञान' से सम्बन्धित तो कुछ होता ही नहीं जो कि वास्तव में वास्तविक 'धर्म-विधान' होता है; आध्यात्मिक क्रिया (योग की क्रिया साधना) भी इसमें कुछ नहीं होती जो वास्तव में वास्तविक धर्म के क्षेत्र में प्रवेश होने वाली मान्यता प्राप्त पात्रता होती है । इतना ही नहीं, 'तप' में जीव-रूह-सेल्फ वाला 'स्वाध्याय' से  सम्बन्धित भी कुछ नहीं होता है जो नीचे से ऊपर की ओर क्रमश: दूसरा (स्वाधयाय), तीसरा (अध्यात्म) और चौथा यानि अन्तिम मंजिल (तत्त्वज्ञान) अर्थात् चार श्रेणी (शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर) में से 'तप' शारीरिक मात्र श्रेणी का विधान होने के नाते धर्म के अन्तर्गत नीचे से ऊपर के क्रम में प्रथम सोपान मात्र वाला बना रह गया, जबकि कष्ट सहन की स्थिति सर्वाधिक होती रहती है । इसमें जो कुछ भी उपलब्धि होती रहती है, अभिमान-अहंकार से भरी पूरी होती है जिसके कारण धर्म में भावना को देखते हुए नीचे से ऊपर को पहला भी स्थान मिल गया। भाव को नहीं देखना होता तो अभिमान-अहंकार के चलते इसको  धर्म में कोई स्थान ही नहीं मिलता ।

एक तरह से देखा जाय तो 'तप' जड़ता-जिद्द-हठ, अशिक्षा और अहंकार आदि के अन्तर्गत संयुक्त रूप में होने-रहने वाला विधान ही-रह गया है। जैसा कि उपर्युक्त पैरा में बताया जा चुका है कि ऊपर से नीचे के क्रम में 'तप' का पहले नम्बर के परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान से सम्बन्धित 'तत्त्वज्ञान' से कोई कुछ लेना-देना तो है ही नहीं; दूसरे नम्बर वाले आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-स्पिरिट- दिव्य ज्योति-ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव से सम्बन्धिात आध्यात्मिक क्रिया-कलाप से भी इसका कोई लेना-देना नहीं होता। इतना ही नहीं, तीसरे नम्बर वाले जीव-रूह- सेल्फ-स्व-अहं से सम्बंधित स्वाध्याय विधान से भी इसका कोई मतलब नहीं होता । अरे भइया ! इन तीन की तो बात छोड़िए, चौथे नम्बर में रहने वाले महत्त्वपूर्ण विषय-विधान जो शिक्षा है, उससे भी इसका कुछ लेना-देना नहीं। 

तप से जिद्द-हठ अहंकार वृत्ति मात्र ही:--अब आप सब स्वयं सोचें कि इसको क्या कहा जाय ? यह जिद्द-हठ जड़ता-अहंकार आदि मात्र का ही संयुक्त विधान है या नहीं ? निश्चित ही  है! यदि यह सत्य--खुदा-गॉड-भगवान अथवा धर्मतत्त्व की खोज की भावनाओं से युक्त नहीं होता तो तप को कोई पूछता भी नहीं । इसकी सारी मान्यतायें सत्य की खोज--भगवत् खोज--धर्मतत्त्व की खोज नामक भावना पर ही आधारित है । अन्यथा कुछ भी नहीं। क्या ऐसा कोई बड़ा से बड़ा असुर-राक्षस है जिसकी असुरता में तप का ही विशेष सहारा न हो ? क्योंकि तप के आधार पर वर पाते थे और 'वर' के  आधार पर ही वे अहंकारी- असुर-राक्षस हो जाते थे। प्राय: जितने भी बड़े से बड़े राक्षस हुए हैं, प्राय: सबके सब ही महान तपस्या से गुजरे हुए ही तो रहे हैं । क्या यह सही ही नहीं है ? यदि दो-एक ऋषि-महर्षि भी तप के आधार पर ऊपर उठे हैं-- आगे बढ़े हैं तो जग जाहिर है कि वे महा अहंकारी-क्रोधी के रूप में ही अपनी पहचान बनाए हैं जैसे दुर्वासा-विश्वामित्र आदि-आदि । इन लोगों से समाज को क्षति के सिवाय कुछ मिला ही नहीं। इनके भी रोल समाज में विघटन-विनाशकारी ही रहे हैं । अपने क्रोध और श्राप का शिकार बनाना इन लोगों का भी सहज स्वभाव ही रहा है ।

 वैसे तो आप सब सोच रहे होंगे कि वाह ! यह भी कोई बात है! 'तप' कुछ है ही नहीं ? 'तप' धर्म के अन्तर्गत पहली सोपान है -- पहली सीढ़ी है ? 'तप' का धर्म में कोई अस्तित्त्व और महत्त्व ही नहीं  है ? यह भी कोई बात है कि 'तप' को जिद्द-हठ और अहंकार तक सीमित करके इसके महत्त्व को खत्म कर दिया जाय ? तप और तपस्वी से मेरा कोई विरोध नहीं है अपितु परिणाम के आधार पर एक सही-स्पष्टीकरण है ।
उपर्युक्त सारे प्रश्न कहने-सुनने में तो ठीक ही लगते हैं, मगर वास्तविकता ऐसे (पूर्वोक्त) ही हो तो कहा-लिखा क्या जाय ? यह तो मैंने कभी नहीं कहा कि आप सब मेरी बात को मान लीजिए । हाँ, इतना अवश्य कहूँगा कि सच्चाई को जान लीजिए-- अवश्य ही जान लीजिए और इतना तो अवश्य ही कहता रहूँगा कि सच्चाई को जान-समझ-देख और जाँच-परख के बाद ही कोई निर्णय लिया जाय। मनमाना रहकर और भाव में बहकर नहीं, क्योंकि किसी को भी कोई भी समुचित लाभ मनमाना रहकर भाव में बह करके नहीं मिल सकता। यथार्थता में सच्चाई में रहकर ही किसी को भी उचित और सही लाभ मिल सकता है । 'तप' के सम्बन्ध में पूर्वोक्त पैरा में असुर-राक्षस-क्रोधी आदि-आदि जो कुछ भी कहा गया है, क्या 'सत्य' ही नहीं हैं ? निश्चित ही सत्य ही हैं ! तप को समाज में चाहे जितनी भी मान्यता मिली हो, मगर सच्चाई तो उपर्युक्त पैरा वाली ही है । इसे गहराई से जानने-समझने जाँचने-परखने की है कि फिर से एकबार दोहरा दूँ कि पूर्र्वोक्त पैरा वाली सारी बातें क्या 'सत्य' ही नहीं हैं ?

आप सब निष्पक्ष और तटस्थ भाव में प्रस्तुत 'तप-प्रकरण' को जानें-समझें और जाँच-परख करें तो निश्चित ही आप भी पूर्वोक्त समस्त तथ्यों को सहज ही स्वीकार कर लेंगे । अवश्य ही स्वीकार कर लेंगे । इसमें कोई सन्देह नहीं। क्योंकि बिल्कुल सत्य पर आधारित हैं । 

() त्यागी
तप, त्याग और सन्यास लगभग एक ही श्रेणी के अन्तर्गत होने-रहने वाले भिन्न-भिन्न प्रकार हैं । तप 'सत्य' के लिए, परमेश्वर के लिए--धर्म के लिए दु:-कष्ट-आपदा-विपदा आदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रसन्नतापूर्वक सहज ही सहनशीलता है तो त्याग 'सत्य' की राह में--परमेश्वर की राह में--धर्म की राह में नकारात्मक-झूठी और मायावी चीजों से रहित होना, रहना है ताकि सकारात्मक सत्य और परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान ही एकमात्र अपने (त्यागी के) लिये केवल 'एकमात्र' शेष रह जाय । इसके सिवाय कहीं कुछ भी नहीं चाहिए । यदि नकारात्मक, झूठ और मायावी चीजें अपने पास आती भी हैं तो उन्हें छोड़ देना--हटा देना ही त्याग कहलाता है। मगर आजकल ऐसा है नहीं । जिस किसी प्रकार से 'त्याग' को अपना भी  लिया है यानी मायावी चीजों का त्याग कर दिया है, उसके स्थान पर सत्य-धर्म अथवा भगवान को अपनाने के बजाय अपने 'त्याग' के अहंकार को स्थान देकर अहंकार को ही सारी महत्ता-गुणवत्ता देने में जुड़ जा रहे हैं जिससे त्याग का अस्तित्त्व-मर्यादा भी धार्मिक दृष्टि में समाप्त हो जाया करती है । हाँ ! अज्ञानी कर्म काण्डी समाज में इन्हें भी तपस्वी-सन्यासी की तरह ही अच्छा सम्मान मिलता है ।
वास्तव में तप जैसे ही त्याग में भी भावना की ही प्रधानता है। यानी त्याग भी एक प्रकार का 'सत्य' की--परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान की--धर्मतत्त्व की खोज ही है, मगर तप से भिन्नता इसमें यह है कि तप में घोषित रूप से विषय-वस्तुओं की अस्वीकारोक्ति नहीं है, सहजतापूर्वक-प्रसन्नतापूर्वक कष्ट-सहन मात्र है जबकि त्याग में घोषित रूप से दु:-कष्ट आपदा-विपदा-प्रतिकूलता का शब्द ही नहीं है यानी सहनशीलता इसमें महत्त्वपूर्ण नहीं अपितु त्याग महत्त्वपूर्ण है । प्रतिकूल विषय-वस्तुओं की पहले से ही अस्वीकारोक्ति और यदि किसी स्थिति-परिस्थितिवश अपने पास आ भी गयी हो तो उसे छोड़ देना--हटा देना प्रधान है ।
त्याग विधान में रहने-चलने वाला व्यक्ति त्यागी कहलाता है । हालाँकि वास्तविकता तो यह है कि तप में भी त्याग और त्याग में भी तप समाहित रहता है इसलिए त्याग भी एक प्रकार का तप और तप भी एक प्रकार का त्याग है।
'सत्य' की खोज की--परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान के खोज की-- धर्मतत्त्व की खोज की उत्तम भावना के साथ होने-रहने के बावजूद भी तपस्वी जिद्द-हठ-अहंकार प्रधान हो जाया करता है । अपनी उद्देश्य मूलक खोज वृत्ति से हटकर तप के अहंकार-अभिमान से ग्रसित हो जाया करता है जिससे उसका सत्य-परमेश्वर-धर्म मूलक खोज की भावना भी भूल जाया करती है। ठीक-ठीक इसी  प्रकार ही त्यागी के त्याग की स्थिति-परिस्थिति भी होती है । कुल मिलाकर जैसा तप वैसा त्याग ।

() सन्यासीगण
'सन्यास' धर्म अथवा परमात्मा-परमेश्वर-भगवान की खोज के अन्तर्गत प्रारम्भिक क्रिया-कलाप के साथ ही साथ एक बहुत ही कठिन संकल्प और संकल्प का पालन भी है । वास्तव में सन्यास का अर्थ परमेश्वर की खोज में पारिवारिक-सांसारिक सम्बन्धों सहित सुख-भोग से अपनी इन्द्रियों को बिल्कुल नेस्त कर देना अर्थात् पूर्णतया भोग-विषयों से अपनी इन्द्रियों को मोड़-तोड़ कर पूर्णतया परमेश्वर की खोज में --एकमात्र परमेश्वर की खोज में ही जोड़ लेना होता है अर्थात् भोग्य सामग्रियों से अपनी इन्द्रियों के सम्बन्धों को बिल्कुल ही समाप्त कर परमेश्वर की खोज-प्राप्ति में लग-लगा जाना मात्र ही सन्यास है। वैसे तो त्याग और सन्यास में कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं होता बल्कि दोनों के बीच में आपस में मामूली सा अन्तर होता है । दोनों में मुख्य अन्तर यह है कि त्याग में आने वाली विषय-वस्तुओं को प्राप्त करने के बजाय त्याग दिया जाता है जबकि सन्यास में विषय-वस्तुओं को त्यागने के बजाय आने वाली विषय-वस्तुओं से अपनी इन्द्रियों के आकर्षण को ही समाप्त कर दिया जाता है । सन्यास एक तरह से वैराग्य का ही बाह्य रूप है तो वैराग्य सन्यास का अन्त: भीतरी रूप ।
सन्यास भी वैसे तो भगवत् खोज और प्राप्ति हेतु अपने आपमें एक बहुत ही ऊँची स्थिति है मगर भगवत् खोज और प्राप्ति के लिए ही हो तब । वैसे तो तप और त्याग की भाँति ही सन्यास में भी प्रारम्भिक क्रिया-कलाप स्थिति बहुत ही अच्छी और ऊँची होती है मगर ज्यों-ज्यों सन्यास की स्थिति आगे बढ़ती जाती है त्यों-त्यों ही भगवत् खोज और प्राप्ति का स्थान मिथ्याहंकार लेता जाता है । आगे चलकर परिणाम यह होता है कि सन्यासी के अन्त:करण्ा से भगवत् खोज और प्राप्ति की स्थिति बिल्कुल ही समाप्त होकर उसके स्थान पर मिथ्याभिमान-मिथ्याहंकार की स्थिति-स्थापित हो जाती है । यहीं से इस सन्यास-सन्यासी का भारी दोष होता है  और यहीं से सन्यासियों का पतन प्रारम्भ हो जाता हैं। जो आगे चलकर भगवत् खोज और प्राप्ति की बजाय अपने मिथ्याभिमान-मिथ्याहंकार का ही गुणगान भी करने-कराने लगते हैं जिससे सन्यासी अपनी मंजिल को पाने की बजाय पतन को प्राप्त हो जाते हैं वे अपने मंजिल से च्युत हो जाते हैं ।

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