कथावाचक अथवा शास्त्रीगण

करपात्री, मुरारी बापू, आशाराम बापू, सुधांशु, किरीट भाई, राम किंकर उपाध्याय और ऐसे-ऐसे बहुत से कथावाचकगण हैं जो कर्मकाण्डी मान्यता के अन्तर्गत किसी शास्त्र विशेष पर (जैसे भागवत् महापुराण, रामायण् , श्री रामचरित मानस, गीता आदि-आदि ग्रन्थों पर थोड़ा-बहुत अध्ययन-अध्यापन कर-कराकर खासकर श्री राम और श्री कृष्ण जी के लीला वर्णनों को जो हँसाने वाला हो, रुलाने वाला हो, जनमानस को रिझाने वाला हो अर्थात् ऐसे लीला प्रकरणों को जिसमें जनमानस प्राय: रुचि लेते हैं और अधिकाधिक दान-दक्षिणा देते हों; उसे खूब इधर-उधर के प्रकरणों को ले-लेकर जोड़-घटाकर वर्णन करते हैं--इसकी परवाह किए बगैर कि इनकी अधिकतर व्याख्यायें जोड़-घटाव और मनोरंजन मात्र के लिए हैं, न कि धर्म-सम्बन्धी कोई खास उत्प्रेरक । ऐसा वर्णन करते-करते जनमानस को कभी हँसाते हैं तो कभी रोते-रुलाते हैं और देखते हैं कि अब जनमानस इनके पक्ष-समर्थन में आ गया है तब वे अपने उद्देश्य मूलक दान-दक्षिणा वाले उध्दरणों को मान्यता प्राप्त सद्ग्रन्थों से खोज-खोज कर भाव में बहते-बहाते हुए श्रोतागण के बीच काफी प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करते हैं और उसी में झूम-झाम कर जनता भी खूब (बहुत) ही भेंट-चढ़ावा देना शुरू कर देती है। लगता है कि मुक्ति पाने का इस दान-दक्षिणा-भेंट-चढ़ावा के सिवाय दूसरा कोई उपाय ही नहीं ! जबकि 'धर्म' यह ही हो ऐसा नहीं है । 

ये गिद्ध जैसे ही :-- वास्तविकता तो यह है कि इनकी अपनी वास्तविक स्थिति ठीक गिद्ध पक्षी के समान होती है जो सर्वथा त्याज्य है। जनमानस को भी चाहिए कि इनको त्याज्य भाव में देखे क्योंकि ये मन्च पर शास्त्रों के उध्दरणों को उद्धृत कर-करके हँसते-हँसाते और रोते-रुलाते हुए नाटकीय लहजे में अपने को ऐसा प्रस्तुत करते हैं कि लगता है कि ये कितने उत्तम कोटि के भक्त हैं, बहुत ही उत्तम कोटि के भक्त हैं ये । मगर वास्तविकता क्या है कि इन सारे उध्दरणों-प्रकरणों के पीछे अधिक से अधिक  कितना पैसा अर्जित कर लें--मात्र पैसा चढ़ावा पाने के लिए जैसे-जैसे जनता का भाव पाते हैं, वैसे-वैसे  अपने आप को प्रस्तुत करने लगते हैं। वास्तविकता यह है कि न तो खुद में ये धार्मिक (भक्त-सेवक) हैं और न जनता के धर्म (भक्ति-सेवा) से इनका कोई मतलब (प्रयोजन) है । जैसे गिद्ध आसमान में प्राय: सभी पक्षियों से ऊँचा उड़ान भरता है, मगर दृष्टि उसकी डांगर (मरे हुए पशुओं) पर ही होती है। ठीक इसी प्रकार से मंच पर व्याख्यान के अन्तर्गत इनकी भक्ति की ऊँचाई तो उत्तमतर और श्रेष्ठतर दिखायी देती है, मगर इनकी दृष्टि मात्र पैसा (दान-दक्षिणा) और विषय (पारिवारिक विषय) भोग की ही होती है। यदि ये जान जायें कि इनको पैसा नहीं मिलने वाला है तो ये कार्यक्रम भी देना बन्द कर दें । हर हाल में इन्हें अधिकाधिक पैसा चाहिए, दान-दक्षिणा चाहिए ।

ये 'भूत' प्रधान ही :---ऐसे शास्त्री-कथावाचक जन प्राय: 'भूत' प्रधान होते हैं। वर्तमान के तो ये घोर विरोधी होते हैं । ये वर्तमान अवतार के विषय में तो जनमानस के धर्मभाव में अवतरित भगवत्ता के विरोध में मीठा जहर घोलने की सारी जिम्मेदारी अपने ही सिर-माथे ले लेते हैं । इनके इन विरोधात्मक बातों का जनमानस के धर्मभाव रूप दिल-दिमाग पर भारी दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि इनके सारे तथाकथित धर्मोपदेश भूतपूर्व भगवदावतारियों (भगवान् श्री विष्णु जी, भगवान् श्री राम जी और भगवान् श्री कृष्ण जी) के लीलाचरित्रों पर ही  अधिक होते हैं । चूँकि ये भगवान् के पूर्व अवतारों के लीलाचरित्रों को ही विशेष मान्यता देने वाले होते हैं जिस पर जनमानस की भी मान्यता सहज ही ठहर जाती है, इसलिए इनकी बातों पर जनमानस अधिकाधिक विश्वास करने लगता है और वर्तमान अवतार के प्रति नाना प्रकार के झूठ और विकृत-भ्रान्तियों का इनके द्वारा शिकार होकर भगवद् विमुख हो जाता है । मोक्ष से वंचित रह जाता है जो मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य होता है । क्योंकि मोक्ष देने का एकमेव एकमात्र अधिकार केवल वर्तमान अवतार के पास ही होता है । अन्य किसी के पास नहीं।

ये बिल्कुल ही अस्तित्त्वहीन होते हैं:-- योग-अध्यात्म और तत्त्वज्ञान की महत्ता  इनके पल्ले बिल्कुल ही नहीं पड़ती । न तो ये योग-अध्यात्म और तत्त्वज्ञान की महत्ता को जानते ही हैं, न तो स्वयं स्वीकार ही करते हैं और न जनमानस को स्वीकार करने देते हैं । यदि किसी श्रध्दालु भक्त में योगी-महात्माओं और वर्तमान अवतार के प्रति जिज्ञासा-श्रध्दाभाव बनती भी है तो ये उसको भी नाना तरह से समझा-बुझाकर उसके वर्तमान कालिक के प्रति उत्पन्न हुए श्रध्दाभाव को समाप्त करते हुए भूतकालिक स्थिति-परिस्थितियों से जोड़-जुड़ाकर अपने में जोड़े-बनाये रखने का प्रयत्न करते रहते हैं क्योंकि पूर्णावतार तो पूर्णावतार ही है, वर्तमान कालिक आध्यात्मिक महात्मागण के सामने भी इनका कोई अस्तित्त्व नहीं होता है । आध्यात्मिक महात्मागण  के समक्ष भी इनका अस्तित्त्व नगण्य सा होता है अर्थात् नहीं के बराबर होता है । यदि ये वर्तमान कालिक महात्मन् और पूर्णावतार को स्वीकार करने दें तो इनका अपना अस्तित्त्व ही समाप्त हो जाए। क्योंकि इन्हें कोई पूछेगा ही नहीं।  फिर ऐसा ये क्यों करें ?

भय से ग्रसित-इनकी राय-सुझाव भी भ्रामक:--धर्म-प्रेमी सत्यान्वेषी सांस्कारिक जिज्ञासुजन वर्तमान कालिक पूर्णावतार की स्थिति-परिस्थिति वश सत्संग व धर्मोपदेशों को सुन-सुनकर और वर्तमान लीला कार्यों को सुन-जानकर प्रभावित और आकर्षित होकर अपनी विश्वसनीयता को पुष्ट करने के लिए जब वे राय-परामर्श हेतु इन कथावाचक-शास्त्री जनों के पास जाते हैं तो ये सब विशेष ही रुचि ले-दे करके उनके समक्ष शास्त्रीय प्रमाणों को प्रस्तुत कर-करके ऐसे-ऐसे भ्रामक सुझाव देते हैं कि 'अरे ! वो भगवान् बनता है ! पिछले भगवानों को कोई मान्यता नहीं देता हैं ! आप लोग झूठे भरम-भटक रहे हैं, फँस रहे हैं! उनकी ऑंखों में सम्मोहन है ! जो कोई भी उनके सामने पड़ेगा तो उनको वे हिप्नोटाइज (सम्मोहित) कर लेगें ! क्या श्री विष्णु जी, श्री राम जी और श्री कृष्ण जी भगवान् नहीं हैं जो आप लोग उन्हें छोड़कर इनके पीछे जाते हो !' आदि-आदि प्रकार से उन जिज्ञासुजनों को समझाने का इन कथावाचक-शास्त्रीजनों का मुख्य कारण या उद्देश्य यह होता है कि जनमानस जब (वर्तमान कालिक पूर्णावतार को स्वीकार कर लेगा तो उन्हीं के अनुसार रहने-चलने लगेगा, फिर इन कथावाचकशास्त्री जनों की सारी मान्यतायें ही समाप्त होने लगेंगी--इन लोगों को मिलने वाले मान-मर्यादा-चन्दा-दान-दक्षिणा-भेंट-चढ़ावा और कार्यक्रमों का पारिश्रमिक आदि भी बन्द हो जायेंगे--उनके सामने इन लोगों को कोई पूछेगा ही नहीं --इस प्रकार के भय से ये कथावाचक-शास्त्रीजन ग्रसित हो जाते हैं। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि वर्तमान कालिक कुछ इने-गिने सांस्कारिक धर्म-प्रेमी जिज्ञासुओं को छोड़कर अधिकतर लोग ही (प्राय: सभी लोग ही) भरम-भटक कर वर्तमान कालिक पूर्णावतार से मिलने वाले 'सम्पूर्ण' और 'परमलाभ' से वंचित रह जाते हैं ।
वे वर्तमान में तो 'हटो-हटो' घोषित करने लगते हैं और चले जाने के पश्चात् 'हरे-हरे' कह-कह कर पुकार करने लगते हैं जबकि किसी को भी कोई भी लाभ भूत वाले से कभी भी नहीं मिल सकता; जब भी कोई लाभ मिलेगा तो वर्तमान से ही मिला है और मिल भी रहा है। गरुड़-नारद-लक्ष्मण-हनुमान-शवरी-उध्दव-अर्जुन-गोपियों को देखें, किसी ने भी भूत वाले को नहीं वर्तमान वाले को ही स्वीकार किया था ।  वर्तमान के ही भक्ति-सेवा-प्रेम में लगे थे, पूर्व के नहीं ।
इन्हीं कथावाचक शास्त्रीजनों में जो अधिक नाटकीय यानी पूर्वकालिक अवतारों के लीला चरित्रों के अन्तर्गत विरोधाभाषी  दु:ख और कष्टकारक प्रकरणों को लेकर मंच से जनमानस को रोते-रुलाते तथा अनुकूल और खुशहाल प्रकरणों को ले-ले करके हँसते-हँसाते और रिझाते हुए प्रभावित करते हैं और तब जब जनमानस के भारी भीड़ को अपने पीछे उमड़ता हुआ देखते हैं तो इन्हें अब कथावाचक-शास्त्री बने रहने में परता नहीं पड़ पाता है । तब ये लोग जनमानस के धन और धर्मभाव को उनके बहते हुए भक्ति-भाव के चलते दोहन-शोषण करते हुए सन्त-महात्मा बनने लगते हैं और कथा-प्रवचन करते-करते उसी में मनमाना ऊल-जलूल योग-अध्यात्म और तत्त्वज्ञान पर भी उपदेश देने लगते हैं और उसी को कभी कथा, कभी प्रवचन और कभी सत्संग कह-कहकर वर्णन करने लगते हैं । यानी इन्हें इन तीनों का अन्तर भी नहीं मालूम होता है । योग  या अध्यात्म और तत्त्वज्ञान पर इस प्रकार दिये गए इनके उपदेश सरासर भ्रामक तो होते ही हैं, मिथ्या यानी झूठ और गलत भी होते हैं, लेकिन जनमानस उनके चालों-जालों में फँसकर उसी भरम-भटकाव का शिकार हो जाया करता है ।

अपमान और शर्म:--इतना ही नहीं, ये कथावाचक शास्त्रीजन इस भरमे-भटके जनसमूह को अपने पीछे देखकर अब कथावाचक-शास्त्री कहलाने में अपने को अपमानित और शर्म तो महसूस करते ही हैं, ध्यात्मिक सन्त-महात्मा बने रहने-कहलाने में भी अब इन्हें अपमान-शर्म महसूस होने लगता है और पूर्वकालिक लीला-अवतार का चरित्र-वर्णन करते-करते स्वयं लीला पुरुष बनने लगते हैं और अपने पीछे रहने-चलने वाले समर्पित-भक्तों की टीम-टोली बनाकर अब कुछ तो अपनी मान्यता भी लीला पुरुष-पूर्णावतार के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं कि 'एकोऽहं द्वितीयोनास्ति ।'। राजसत्ता मिल जाती तो ये पूर्ण रावण जैसे ही हो जाया करते फिर भी राजविहीन रावणीय विचार-भाव वाले तो ये होते ही हैं । नि:संदेह यह सत्यता पर आधारित उल्लेख है, न कि किसी का किसी प्रकार की निन्दा-अपमान करने के अन्तर्गत । जो कोई जाँच करना चाहे-मिल बैठकर सच्चाई जान-समझ-देख-परख सकता है ।

गुरु और सद्गुरु से ही:--ये कथावाचक-शास्त्री जी लोग इस बात को भूल जाते हैं कि आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-दिव्य ज्योति-ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव और इनकी प्राप्ति से सम्बन्धित योग-अध्यात्म और परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान और इनकी प्राप्ति से सम्बन्धित 'तत्त्वज्ञान' विधान--ये दोनों ही पढ़ने-सुनने  और विचार मात्र से जानने-समझने में आने वाले नहीं हैं, भले ही लाखों-करोड़ों जन्मों तक पढ़ा-समझा- विचार किया जाय । इन दोनों (योग-अध्यात्म और तत्त्वज्ञान) की वास्तविक जानकारी क्रमश: सक्षम अध्यात्मवेत्ता (गुरु) और पूर्णावतार रूप तत्त्ववेत्ता (सदगुरु) से ही यथार्थ जानकारी और साक्षात् दर्शन सहित वास्तविक समझ की प्राप्ति सम्भव है । चाहे जो कोई भी हो, चाहे जितना बड़ा शास्त्री-विद्वान-दार्शनिक आदि क्यों न हो, मगर योग-अध्यात्म की वास्तविक जानकारी सक्षम अध्यात्मवेत्ता (गुरु) के सिवाय सम्भव ही नहीं है क्योंकि यह शिक्षा और श्रवण-मनन-चिन्तन और निदिध्यासन का विषय ही नहीं है । यह तो योग-क्रिया अथवा आध्यात्मिक क्रिया अथवा समुचित साधनात्मक पध्दति से ही सम्भव है ।
 ठीक इसी प्रकार 'तत्त्वज्ञान रूप भगवद्ज्ञान' भी शिक्षा-स्वाध्याय (श्रवण एवं मनन-चिन्तन-और निदिध्यासन) आदि से तो सम्भव ही नहीं, योगिक-ध्यात्मिक क्रियाओं से भी सम्भव नहीं है । तत्त्वज्ञान के लिये पूर्णावतारी रूप तत्त्ववेत्ता (सदगुरु) की शरणागति और एकमात्र केवल उन्हीं से इसकी प्राप्ति सम्भव है । पूरे ब्रह्माण्ड में अन्य किसी से भी नहीं ! कदापि नहीं!!

अवतार या लीला पुरुष बनने वाले पद नहीं:-- इन कथावाचक-शास्त्री लोगों को कौन समझाए कि योग-सिध्द सक्षम अध्यात्मवेत्ता (गुरु) ही बनने-बनाने का पद नहीं होता । तब तो अध्यात्म का पिता रूप 'तत्त्वज्ञान' और आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-शिव ज्योति के भी पितारूप परमात्मा- परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान की प्राप्ति कराने वाला तत्त्ववेत्ता (सदगुरु) कैसे बना जा सकता है अर्थात् नहीं बना जा सकता है । तब उस परमपद पर मनमाना अपने आपको घोषित करना--लीला पुरुष बनना--इसे झूठा और भ्रामक मात्र न कहकर घोर हास्यास्पद भी कहा जाय तो भी कम ही है क्योंकि भगवान और भगवदावतार कोई बनने-बनाने की विषय-वस्तु-पद नहीं होती है ! यह तो वह पद है जो था, है और सदा रहने वाला भी है। 'एक' था, 'एक' है और सदा 'एक' ही रहने वाला भी है।

अवतार या लीला पुरुष, किसी अन्य देवी-देवता का अथवा मन्त्रदाता-कथावाचक का नहीं:-- ये कथावाचक-शास्त्रीगण जी पूर्व के अवतार और देवी-देवताओं का लीला वर्णन और कथा-चित्रण करते-कराते हुए इस बात को महत्त्व क्यों नहीं देते कि पूर्णावतार अपने अनुयायी-भक्त-सेवकों से न तो किसी का भी कोई मन्त्र जाप करवाता है, न तो किसी अन्य का कोई पूजा-पाठ करवाता है और न तो किसी अन्य देवी-देवता का कोई कथावाचन ही करता-कराता है, न तो किसी शास्त्र विशेष पर ही कथावाचन करता है। इतना ही नहीं, वह किसी से दान-दक्षिण् भी नहीं लेता है । अपने उपदेश की कोई फीस भी नहीं माँगता। पूर्णावतार मन्च पर कभी नाच-गान कर किसी का कीर्तन नहीं करता-कराता है । श्री राम जी श्री विष्णु जी का और श्री कृष्ण जी श्री राम जी का अपने उपदेश में श्रोतागण् से कीर्तन नहीं करते-कराते थे । जाप नहीं कराते थे, अजपा-जप  की क्रिया और ध्यान भी नहीं  करते-कराते थे बल्कि स्वयं अपने वर्तमान कालिक पूर्णावतार रूपी भगवत्ता को 'तत्त्वज्ञान' के प्रायौगिक विधान से साक्षात् कराते हुए उपदेश करके गोपनीयता की मर्यादा रखते हुए परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् को जनाते-दिखाते और विराट रूप को साक्षात् दिखलाते हुए अपने वास्तविक भगवद् रूप का परिचय-पहचान कराते हैं और समर्पित शरणागत भक्त-सेवकों को सम्पूर्ण (संसार-शरीर-जीव-ईश्वर और परमेश्वर) पाँचो को ही यथा स्थान और एकत्त्व  बोध रूप में भी अपने विराट रूप सहित पृथक्-पृथक् बात-चीत सहित साक्षात् दर्शन भी कराते हैं।

इन्हें जीव की भी जानकारी नहीं:--ये वर्तमान कथावाचक जी लोग अपने भक्तजनों को विराट दर्शन कराने की बात तो दूर रही, क्या वे स्वयं भी मामूली 'हम' जीव का भी दर्शन किए हैं, कह सकते हैं ? नहीं! कदापि नहीं!! इन कथावाचक शास्त्रीजनों को तो परमेश्वर का दर्शन तो दुर्लभ ही रहा है, है भी, ईश्वर दर्शन भी इनके लिए दुर्लभ चीज ही रही है और है भी । इतना ही नहीं, ऐसा धरती का कोई कथावाचक शास्त्री नहीं जो कह सके कि हम जीव मात्र को भी जाने-देखे हैं ।
 इन शास्त्री लोगों की बात तो अलग हटाइए, वर्तमान कालिक तथाकथित  आध्यात्मिक गुरुजन और बनने वाले सद्गुरुजन-भगवान जी लोग भी नहीं कह सकते कि 'हम जीव जानें-देखें हैं ।' क्या धरती का कोई भी कथावाचक-शास्त्री और आध्यात्मिक गुरुजन भी मेरे इन उपर्युक्त कथनों को ग.लत प्रमाणित करने का साहस कर सकते हैं ? जबकि मैं (सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस) तो आवश्यकता पड़ने पर भगवद् समर्पण-शरणागत के आधार पर प्रायोगिक आधार पर भी अपने उपर्युक्त समस्त कथनों को प्रमाणित-सत्यापित करने-कराने के लिए सदा-सर्वदा तैयार हूँ । जाँच-परख करते हुए स्वयं ही क्यों नहीं देख लेते ?

पूर्णावतार-तत्त्ववेत्ता सद्गुरु:--पूर्णावतार-तत्त्ववेत्ता (सदगुरु) चाहे वे श्री विष्णु जी हों, चाहे श्री राम जी हों अथवा चाहे श्री कृष्ण जी महाराज ही क्यों न हों, अपने समर्पित-शरणागत भक्त-सेवकों को 'तत्त्वज्ञान' देने के अन्तर्गत संसार-शरीर-जीव-ईश्वर (आत्मा-शिव-ब्रह्म) माया और परमेश्वर (परमात्मा-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान) को सरहस्य बात-चीत सहित पृथक्-पृथक् साक्षात् दर्शन सहित क्रमश: शिक्षा, स्वाध्याय, अधयात्म और तत्त्वज्ञान आदि समस्त जानकारियों को पृथक्-पृथक् भी जनाते-बताते थे । मगर व्यवहार में किसी से मन्त्र-जाप, तान्त्रिक क्रिया, जप-तप कुछ भी नहीं करवाते थे बल्कि सीधे-सीधे समर्पित-शरणागत को ज्ञान-तत्त्वज्ञान देकर अपना असली-वास्तविक रूप दिखाते हुए अपनी सीधी भक्ति-सेवा में लगाते थे । इसकी परवाह किए बगैर कि कोई क्या कहेगा और क्या करेगा । वर्तमान में सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस जी भी तो वही और वैसा ही कर-करा रहे हैं । कोई भी जाँच-परख कर निर्णय ले सकता है कि क्या ये उपर्युक्त बातें श्री विष्णु-राम-कृष्ण जी के जैसी ही--सही ही हैं अथवा नहीं ? निश्चित ही मिलेगा कि ये सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस भी तत्त्वज्ञानदाता ही हैं।
हम तो समस्त कथावाचक-शास्त्रीजनों से और योग-साधना-ध्यात्मिक क्रिया कराने वाले अध्यात्मवेत्तागण महात्मनों से भी यही कहेंगे कि वे थोड़ा भी जानने-समझने की कोशिश तो करें और किसी भी गुरुजन के शिष्यजन भी उपर्युक्त पैरा के तथ्यों को जानने-समझने की कोशिश भी तो करें कि क्या पूर्वोक्त पैरा की सारी की सारी बातें सत्य ही नहीं है ? तो निश्चित ही पता चलेगा कि सत्य ही हैं और बिल्कुल ही सत्य ही हैं ।
अब समस्त तथाकथित भगवान जी लोगों को उपर्युक्त आधार पर आत्म-निरीक्षण कर-कराकर ईमान से सच्चाई को अपना कर वर्तमान कालिक पूर्णावतार-तत्त्ववेत्ता को अपनाकर किसी अपमान-मान-सम्मान को आड़े लाने के बजाय इनसे ऊपर उठकर समर्पित-शरणागत होकर खुदा-गॉड-भगवान को प्राप्त कर परमलाभ से लाभान्वित होते हुए अपने-अपने शिष्यगण के जीवन को भी सफल-सार्थक बनाने में बेहिचक आगे आना चाहिए। क्या नहीं आना चाहिए ? जाँच-परख की मनाही तो कर नहीं रहे हैं । जाँच-परख की जाय, खूब की जाय, मगर हर प्रकार से सत्य ही होने पर तो स्वीकार किया जाय । सबकी अन्तिम भलाई भी तो इसी में है । जिद्द-हठ-अहंकार से तो कुछ मिलना नहीं  है जो कुछ भी मिलना है तत्त्वज्ञान से ही मिलना है ।

 भगवान् की शरण लेने से किसी की मर्यादा गिरती नहीं अपितु उठती ही है:--भगवान की शरण में आने से किसी की भी कभी भी कोई मर्यादा नहीं गिरती अपितु सदा-सर्वदा बढ़ती ही रहती है । उदाहरण के लिए देखा जाय कि सत्ययुग में श्री विष्णु जी के समय में, त्रेतायुग में श्री राम जी के समय में और द्वापरयुग में श्री कृष्ण जी के समय में वर्तमान की तरह ही बहुत से योगी-यति-ऋषि-महर्षि-ब्रह्मनिष्ठ-तथाकथित भगवानों की कमी नहीं थी, पर्याप्त संख्या में थे मगर इन लोगों के शिष्यजनों को भगवद् भक्ति-सेवा के अस्तित्त्व और महत्ता-मर्यादा के अन्तर्गत तो कहीं किसी को कोई अस्तित्त्व-मर्यादा नहीं मिली । क्या कहीं किसी का अस्तित्त्व, महत्ता-मर्यादा है ? नहीं ! कदापि नहीं !! इन तथाकथित ऋषि-महर्षि-ब्रह्मनिष्ठ जन भी भक्ति-सेवा के अस्तित्त्व, महत्ता-मर्यादा में कहीं नहीं हैं जबकि वे भगवान के पूर्णावतार तो नहीं ही बन पाए, भगवान के समर्पित-शरणागत गिध्द (जटायू), कौवा (काक भुशुण्डि), बानर (हनुमान), भालु (जामवन्त) आदि-आदि के बराबर भी होने-रहने की मान्यता नहीं पा सके, बड़े होने की बात ही कहाँ ? क्या आप इन तथाकथित गुरुजनों के शिष्यजनों को उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर समझने-सम्भलने की कोशिश नहीं करना-कराना चाहिए ? करना-कराना ही चाहिए । अवश्य ही करना-कराना चाहिए क्योंकि हर किसी का मानव जीवन एक अनमोल रतन है । इसको कभी भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए । ईमान से सत्यता को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक-सफल बना ही लेना चाहिए ।

वर्तमान ही सर्वश्रेष्ठ:--यदि कथावाचक-शास्त्री जी लोग मन्त्र जाप आदि-आदि कर-करवाकर भगवान बनना चाहते हैं और पतनोन्मुखी सोऽहँ-साधना वाले तथाकथित अध्यात्मवेत्ता जी लोग भी यदि आध्यात्मिक क्रिया कर-करा करके भगवान बनना चाहते हैं तथा उपर्युक्त दोनों वर्ग अपने में और सबमें समान रूप से भगवान होने-रहने की उद्धोषणा करते हैं--तो क्या ऐसा कभी पूर्व के अवतारों में हुआ है ? नहीं ! कदापि नहीं !! इतना ही नहीं, नारद जी यदि जाप भी करते थे तो श्री विष्णु जी का- 'नमो भगवते वासुदेवाय' अथवा 'श्रीमन् नारायण, नारायण, नारायण' अथवा 'हरेर्नामैव, हरेर्नामैव, हरेर्नामैव' और हनुमान जी तो इन पूर्व के अवतार (श्री विष्णु जी के) नारद जी वाले इन नामों में से किसी का भी कभी भी कोई जाप न करके केवल वर्तमान का 'जय श्री राम, जय श्री राम, जय श्री राम' कह-कह कर जयकार-उद्धोष  करते रहते थे । ऐसे ही अर्जुन भी कभी भी श्री विष्णु जी और श्री राम जी का नाम नहीं जपे बल्कि वर्तमान कालिक श्री कृष्ण जी की ही आज्ञानुसार रहे-चले । नारद जी भी बदलते अवतार क्रम में वर्तमान श्री राम और श्री कृष्ण जी को ही श्रेष्ठता देते रहे ।
क्या इन पूर्वोक्त तथ्यों के आधार पर अपनी स्थिति और श्रेणी हर किसी तथाकथित भगवान को नहीं जान-देख -परख लेनी चाहिए ? मन्त्र जाप, नाम जाप, योग-क्रिया-साधना मात्र आदि करना-करवाना अपूर्णता-अधूरापन का ही तो संकेत है। क्या नहीं है ? अवश्य ही है। ऐसे लोग भी कभी भगवान और भगवदावतार हो सकते हैं ? नहीं ! कदापि नहीं !! भगवान और भगवदावतार इन मन्त्र जाप, नाम जाप, योग की क्रियाकलाप आदि से परे और परम होता है जो 'एक' था, 'एक' है और सदा ही 'एक' ही रहने वाला भी है । उसी 'परमतत्त्वम्' का भू-मण्डल पर परमधाम से आना ही अवतार-भगवदावतार होता-कहलाता है ।

'गुरु' मात्र ही, भगवान् नहीं:--शिष्य-अनुयायीगण चाहे वे जिस किसी गुरु के ही हों, ईमान से सच्चाई को अपनाएँ तो नि:संदेह यह रहस्य उनके सामने प्रकट हो जायेगा कि जीवन का उद्देश्य गुरु खोजना-पाना और गुरु-भक्ति मात्र करना-कराना न कभी था, न आज है और न आगे रहेगा । खोजना-पाना तो भगवान है ! मोक्ष है ! भक्ति तो भगवान की होती है, गुरु मात्र की नहीं ! गुरु तो पोस्ट मैन-डाकिया की तरह होता है जो मात्र आदर-सम्मान का पात्र यानि आदरणीय हो सकता है, मगर पूज्य-पूजनीय तो एकमात्र परमप्रभु परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान ही हो सकता है अन्यथा दूसरा कोई भी नहीं । क्योंकि 'ज्ञान' तो भगवान का होता है जो केवल भगवद् जिज्ञासुजन के लिए ही होता है ।
      जब हम गुरु को ही पाने में और गुरु में ही चिपकने में लग जायेंगे, तब तो गुरु एक साथ ही हजारों-हजारों होते हैं, हैं भी ! क्या सभी गुरु भगवान जी ही हैं ? क्या इससे आडम्बर-ढोंग और पाखण्ड को बढ़ावा नहीं मिलेगा ? भगवान तो 'एक' था, है और सदा ही 'एक' रहने वाला है। क्या इससे वास्तविक परख-पहचान नहीं हो जायेगी कि हम गुरु को नहीं, भगवान को स्वीकार करेंगे ? गुरु तो मात्र एक डाकिया (Postman) के समान होता है जो भगवान के ज्ञान को भगवद् समर्पित-शरणागत भक्त-सेवकों को देता-रहता है । किसी भी गुरु से पूछा जाय तो पता चलेगा कि ज्ञान वास्तव में भगवान का होता है और भगवद्जन के प्रयोग के लिये होता है । क्या यह सही ही नहीं है ? निश्चित ही सही है। जब हम भगवान खोजेंगे तब हम आडम्बरी-ढोंगी-गुरुओं में भटकने-लटकने नहीं पायेंगे । अपनी सच्ची मंजिल तक अवश्य पहुँच जायेंगे । क्या दत्तात्रेय सच्चाई खोजने हेतु चौबीस गुरुओं तक नहीं बढ़े ? क्या काग भुशुण्डि के लोमस ऋषि ब्रह्मनिष्ठ गुरु नहीं थे ? क्या बाल्मीकि-वशिष्ठ आदि सभी गुरुजन तपोनिष्ठ-ब्रह्मनिष्ठ नहीं थे जो श्री राम जी के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए चरण भक्ति-सेवा माँगे ? क्या नारद जी ब्रह्मनिष्ठ नहीं थे जो केवल पूर्णावतारी श्री विष्णु-राम-कृष्ण जी की ही भक्ति को अपनाये ? इतना ही नहीं, आप लोग एकबार और देख लीजिये । पुन:दोहरा दे रहा हूँ कि किस ऋषि-महर्षि-सन्त-महात्मा-ब्रह्मनिष्ठ के शिष्य का अस्तित्त्व-महत्ता-मर्यादा भक्ति-सेवा के अन्तर्गत जनमानस में है ? किसी का भी नहीं ! अरे शिष्यों की बात तो छोड़िए ! इन तथाकथित गुरुजनों का अस्तित्त्व और मर्यादा भी भगवद् भक्त-सेवक गिध्द (जटायु), कौवा (काक भुशुण्डि) की बराबर भी नहीं रही  है । महादेव-महेश्वर को भी कौवा (काक भुशुण्डि) का शिष्यत्त्व ग्रहण करने में कोई मान-सम्मान आडे नहीं आया । अपमान महसूस नहीं हुआ । क्या महादेव से भी बड़ा कोई ऋषि-महर्षि-ब्रह्मर्षि था, या है ? यदि कोई कहता है कि हमारे गुरुदेव उनसे भी बड़े हैं तो यह सरासर झूठ और छलावा है । इसकी प्रामाणिकता की आवश्यकता हो तो मेरे (सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस के) पास सद्ग्रन्थीय मान्यताओं के आधार पर भरपूर प्रमाण है ।
जब महादेव-महेश्वर को भगवान नहीं बल्कि भगवान के एक कौवा शिष्य-भक्त के शिष्यत्त्व को ग्रहण करने में अपमान नहीं लगा, मान-सम्मान आड़े नहीं आया फिर आप लोग मान-सम्मान को आड़े क्यों आने दे रहे हैं ? क्या किसी भी ऋषि-महर्षि-तपोनिष्ठ- ब्रह्मनिष्ठ का कोई मन्दिर है जहाँ इन लोगों की पूजा-आराधना हो रही हो ? न मन्दिर हो मगर क्या किन्ही मन्दिर में इन लोगों की कहीं कोई प्रतिष्ठित पूजनीय स्थान भी है ? अयोध्या में बाल्मीकि भवन तथा तुलसी मन्दिर और वशिष्ठ भवन आदि भी हैं तो श्री राम जी के नाम पर हैं, न कि उनके तपोनिष्ठ या ब्रह्मनिष्ठ होने के आधार पर हैं । नैमिषारण्य में व्यासपीठ है तो वह भी उनके तपोनिष्ठ होने के कारण नहीं बल्कि श्री कृष्ण जी के श्रीमद्भागवत् महापुराण लिखने पर है । प्रयागराज में भारद्वाज आश्रम है तो वह उनके तप के आधार पर नहीं बल्कि श्री राम जी के वहाँ पहुँचने पर है । ऐसा कोई भी आश्रम जहाँ श्री राम-श्री कृष्ण जी न पहुँचे हों, उसको कहीं भी कोई महत्त्व नहीं मिला । यदि मिला है भी तो बहुत कम और सामान्य मान्यता वाला।

ईमान-सच्चाई से भक्ति-सेवा की महत्ता:--ईमान-सच्चाई से पूर्णावतार की भक्ति-सेवा करने वाले गिध्द-कौवा-वानर-भालू-गिलहरी तक भी श्री विष्णु-राम-कृष्ण जी के साथ-साथ भक्ति-सेवा की महत्ता में-- कोई-कोई तो इनसे भी अधिक छाये हुए हैं । क्या सुधारने-सम्भलने के लिए ये सब उपर्युक्त तथ्य काफी नहीं हैं ? वन्चित रह जाने पर भगवान को कोई दोष दे कर कोई लाभ पा पायेगा ? जबकि आप सभी के समक्ष इतना स्पष्ट तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे हों और तब भी आप सब न चेत-सम्भल पा रहे हों, इसमें भगवान का क्या दोष ? जैसी करनी-वैसी भरनी ।
भइया ! ईमान और सच्चाई को आगे लाइए । सुधरिए और सम्भलिए ! परमतत्त्वम् रूप परमसत्य रूप परमप्रभु को ही अपनाकर उन्हीं की शरण गहिए । इसी में आप सबका परमकल्याण है । मेरी भी यही शुभेच्छा है । भगवान आप सबका भला करें !
 यह सत्य के रूप में आप सबसे अन्तिम बार कहा जा रहा है कि आप चाहे जो कोई भी गुरुजन-तथाकथित सद्गुरुजन अथवा जिस किसी के शिष्यजन ही क्यों न हों, जरा सा निष्पक्ष और तटस्थ भाव में होकर ईमान और सच्चाई से अपने को थोड़ा देखिए तो सही कि क्या यह सत्य ही नहीं है ? कि ऊपर से नीचे के क्रम में परमात्मा- परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान के विषय में कोई दर्शन-जानकारी तो आप सब के पास है ही नहीं, आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-स्पिरिट-ज्योतिर्मय शिव की भी आदि-अन्त सहित यथार्थत: वास्तविक जानकारी भी नहीं है । इतना ही नहीं, धरती का कोई भी धर्मोपदेशक-गुरु चाहे वह कथावाचक शास्त्री हो या वेदान्ती, चाहे वह स्वाध्यायी ('अहं ब्रह्मास्मि' वाले) हों या पतनोन्मुखी सोऽहँ-ज्योतिर्बिन्दु शिव वाले तथाकथित अध्यात्मवेत्ता ही क्यों न हों--जीव क्या है ? कैसा होता है ? कहाँ से आता है ? शरीर में किस प्रकार से प्रवेश करके कहाँ रहता है और अन्तत: निकलकर कहाँ जाता  है ? यह सब किसी को भी मालूम नहीं । आप सब में से किसी में भी यह दम-खम या क्षमता-शक्ति नहीं है कि यह कह सके कि हमने जीव को जाना-देखा है । यह बिल्कुल ही सत्यता और सद्ग्रन्थीय प्रमाणिकता के आधार पर ही कहा जा रहा है। जो कोई चाहे जाँच-परख कर सकता है । मगर सद्ग्रन्थीय सत्प्रमाणों के आधार पर ही--मनमाना नहीं ।
आप सब कथावाचक अथवा वेदान्ती और योगी-आध्यात्मिक गुरुजन को अज्ञान और घोर भ्रमवश झूठी और भ्रामक मान्यता के अन्तर्गत रहने के नाते मेरे उपर्युक्त कथन पर थोड़ा-बहुत तकलीफ हो सकता है। आप के भावनाओं पर थोड़ा-बहुत ठेस भी लग सकता है क्योंकि आपको अपने विषय में दिखाई दे रहा होगा कि मेरे पास इतने  धन-शिष्य-अनुयायीजन हैं । मेरे पास इतने आश्रम हैं । मेरा इतना प्रचार-प्रसार है । मेरी इतनी भारी मान-मर्यादा है । क्या आपके पास कुबेर से भी अधिक धन है ? 33 करोड़ देवताओं वाले इन्द्र से भी अधिक अनुयायी हैं ? आश्रम निर्माण वाले-सृष्टि रचना कर्ता विश्वकर्मा-ब्रह्मा से भी अधिक रचना है ? क्या दस हजार शिष्यों को पीछे-पीछे लेकर चलने वाले सिध्द दुर्वासा से भी अधिक पीछे-पीछे रहने वाले जन और अधिक सिध्दि है ? ब्रह्मा-इन्द्र-महेश से भी अधिक मान-मर्यादा आदि कुछ है ? नहीं ! कदापि नहीं !! ईमान और सच्चाई से जरा सोच-समझ और अपने आप को देख तो लें। फिर मिथ्या अभिमान और मिथ्या अहंकारवश मात्र उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अपने आप को भगवान अथवा भगवदावतार मानना-मनवाना क्या सही और उचित   है ? नहीं ! कदापि नहीं !!
 शिष्यगण को भी मात्र उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अपने गुरुजी को-- तथाकथित सद्गुरुजी को भगवान अथवा भगवदावतार घोषित कर-कराकर उन्हीं में चिपके रहना क्या सही और उचित है ? नहीं ! कदापि नहीं !! तथा हम इतने भारी गुरुजनों का शिष्य और अनुयायी हैं तब भी हमको ऐसा कहा जा रहा है कि हम परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान को तो नहीं ही जानते और आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-स्पिरिट-ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव के आदि-अन्त (क्योंकि आदि-अन्त की आप लोगों की दृष्टि में मान्यता ही नहीं है जबकि सच्चाई में आदि-अन्त है) को भी नहीं जानते ! इतना ही नहीं, हम लोगों को यहाँ तक कहा जा रहा है कि जीव-रूह-सेल्फ-स्व-अहं को भी साक्षात् देखे तो हैं तो कह ही नहीं सकते, यथार्थत: जानते हैं यह भी नहीं कह सकते हाँ अपने कमी को छिपाने के लिए यह अवश्य ही कह सकते हैं कि यह तो एक घोर अहंकारिक बात है । जरा जाँच-परख करके तो यह कह दें । कह ही नहीं पायेगें क्योंकि दिए गए तथ्य सत्य जो हैं क्योंकि झूठ होनेपर तो अहंकार होता मगर यह तो मात्र सत्य ही नहीं अपितु परमसत्य बात है । । 
इस पर मैं (सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस) आपके परमहितेच्छु रूप में यही कहँगा कि मुझे घोर अहंकारी मान लेने मात्र से क्या आपको कुछ मिल जायेगा ? कुछ नहीं मिल पायेगा ! मैं तो यह कह रहा हूँ कि ईमान और सच्चाई से आप अपनी स्थिति-परिस्थिति को देखिए । फिर नि:संदेह निश्चित ही आपको अपने निर्णय में मिलेगा कि उपर्युक्त सारे कथन 'सत्य' ही हैं और सद्ग्रन्थीय आधार पर प्रमाणित भी हैं।

यदि उपर्युक्त बातें समझ में--पकड़ में न आ पा रही होंतो आप सब मुझसे मिल-बैठकर प्रेमभाव से-अपनत्त्व भाव से--ईमान और सच्चाई से वास्तविकता को-- वास्तविक सत्यता को खुले दिल-दिमाग से मुझसे यथार्थत: जान-देख-परख-पहचान कर-करा जाँचिए तो सही। मगर भगवद् समर्पण-शरणागत होने-रहने-चलने की शर्त पर ही क्योंकि 'तत्त्वज्ञान' बगैर भगवद् समर्पित-शरणागत के मिलता ही नहीं और जब तक 'तत्त्वज्ञान' मिलेगा नहीं तब तक उपर्युक्त तथ्यों की बात-चीत-परिचय-पहचान सहित साक्षात् दर्शन और यथार्थत: जानकारी हो ही नहीं सकती। यह एक परम सच्चाई है । इसमें मेरा कोई अहंकार नहीं, बल्कि भगवत् कृपा रूप 'तत्त्वज्ञान' का प्रभाव है । यही एकमात्र 'एक' सच्चाई है । जाँच-परख-पहचान की खुली छूट, मगर सद्ग्रन्थीय आधार पर, मनमाना कुछ भी नहीं, क्योंकि मेरे पास मनमाना नाम की कोई चीज या कुछ भी नहीं है । जो कुछ भी है, सब भगवदीय है। सब भगवत् कृपा ।

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