सच्चे भगवदावतारी की पहचान 'तत्त्वज्ञान' से ही


आप सभी को ही एक बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए कि प्रारम्भ में जब धर्म को स्वीकार करने चले थे या चलने लगे थे तब हम लोगों का लक्ष्य धन-जन एकत्रित करने के लिए, बढ़िया से बढ़िया आश्रम बनवाने के लिए अथवा खूब प्रचारित-प्रसारित होने और काफी मान-सम्मान आदि-आदि पाने के लिए हम सभी गुरुजन-सद्गुरुजन, तथाकथित भगवानजी लोग और अनुयायी-शिष्यगण (धर्म-प्रेमी-धर्मात्मागण) नहीं आए  थे । आप सभी 'ज्ञान-तत्त्वज्ञान' पाने के लिए -- आप अपने निज रूप यानी 'हम' जीव-रूह-सेल्फ को जानने-देखने और पहचानने तत्पश्चात् आत्मा-नूर- सोल-ज्योतिर्मय शिव और परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान् को अलग-अलग जानते-देखते हुए भी बात-चीत सहित साक्षात्-दर्शन पाने के लिए, साथ ही साथ मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध पाने के लिए ही 'धर्म' को स्वीकार किए थे ! क्या यह 'सच' ही नहीं है ? फिर आज धान-जन-आश्रम-मान-सम्मान आदि-आदि झूठे मायावी चकाचौंध के पीछे अपने 'मूल उद्देश्य' से क्यों भटक गए ?
आप सबके पास कितना धन हो गया है जो अपने मूल उदेद्श्य भगवत् प्राप्ति व मुक्ति-अमरता के साक्षात् बोध से ही भटक गए ? क्या कुबेर से भी अधिक धन हो गया है ? नहीं ! कदापि नहीं !!
कितना जन (अनुयायी शिष्यजन) आप बना लिए हैं ? क्या 33 करोड़ वाले देवराज इन्द्र से भी अधिक है ? नहीं ! कदापि नहीं !! 
आप कितनी क्षमता-सिध्दि हासिल कर लिए ? क्या सभी के ही मृत्यु रूप यमराज और सृष्टि के संहारक शंकरजी से भी अधिक ? नहीं ! कदापि नहीं !!
कितने आश्रमों  की रचना (निर्माण) कर-करा  लिए हैं ? क्या सृष्टि के रचयिता विश्वकर्मा और ब्रह्मा जी से भी अधिक ? नहीं ! कदापि नहीं !!
कुल कितने अनुयायी-शिष्य आपके पीछे-पीछे रहते-चलते  हैं ? क्या दस हजार अनुगामियों के साथ चलने वाले दुर्वासा से भी अधिक ? नहीं ! कदापि नहीं !!
जब तैंतीस करोड़ देवताओं का राजा इन्द्र जी भी भगवान् नहीं हैं;--जब सभी को मौत (मृत्यु) देने वाले यमराज जी भी भगवान् नहीं है;--उमा-रमा-ब्रह्मानी जी भी जब भगवान् नहीं हैसभी सिध्दियों के अधिष्ठाता सृष्टि संहारक शंकर जी भी भगवान् नहीं है तो एक बार आप अपने को तो देखिए ! धन(कुबेर)-जन(इन्द्र)-आश्रम(ब्रह्मा) मान-सम्मान (महादेव-महेश) भी भगवान् या भगवदावतारी नहीं हैं तो आप कौन और कितने में हैं ? देखिए तो सही ! झूठी मान्यता कब तक ठहर पायेगी ? मात्र तभी तक तो-जब तक 'सत्य' को समाज में मान्यता नहीं मिल जाती और 'परमसत्य' जब अवतरित हो ही चुका है तो मान्यता तो मिलनी ही मिलनी है । समाज को उस परम सत्य रूप परमात्मा के पूर्णावतार को मान्यता तो देनी ही देनी पड़ेगी । मान्यता देनी तो समाज की मजबूरी होगी-चाहे रोकर दे चाहे हँस कर दे-देनी तो पड़ेगी ही ।
जब ये उपर्युक्त कुबेर-इन्द्र-यमराज-शंकर जी-विश्वकर्मा-ब्रह्मा जी-दुर्वासा आदि -आदि भगवान्-भगवदावतार नहीं बने, अपने को ऐसा घोषित नहीं किए-कराए तो आप लोग ऐसा क्यों बनने-करने में लगे हैं ? अपने को ही क्यों घोषित करने-करवाने में लगे हैं ? क्या ये लोग मन्त्र-तन्त्र वाले मांत्रिक-तान्त्रिक नहीं थे क्या ये लोग ॐ वाले नहीं थे ? सोऽहँ-ह ँ्सो वाले नहीं थे ? क्या ये सिध्द-शक्ति-सत्ता-सामर्थ्य-योग-साधना- अध्यात्म वाले नहीं थे ? क्या ये तथाकथित गायत्री यथार्थत: ॐ देव क्षमता वाले नहीं थे ? क्या ये ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव वाले नहीं थे ? एक बार थोड़ा अहंकार-अभिमान से अलग-ऊपर-परे होकर तो अपने को देखने  का  प्रयास कीजिए, समझ में आने लगेगा। ॐ-सोऽहँ-ह ँ्सो-ज्योति र्बिन्दु रूप शिव न कभी भगवान् थान है और न होगा। ॐ का पितामह और सोऽहँ-     ह ँ्सो का पिता सम्पूर्ण शक्तियों सहित आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-नूर-सोल-दिव्य ज्योति-ज्योति र्बिन्दु रूप शिव का भी पिता व सम्पूर्ण सृष्टि का उत्पत्ति-स्थिति-संहार कर्ता रूप परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप अलम्-गॉड रूप परमात्मा-परमेश्वर ही खुदा-भगवान् था, है और रहेगा भी । उन्हें स्वीकार कर लेने में ही सभी का कल्याण है । परम कल्याण है । अन्यथा अपनी करनी और झूठी मान्यता का दुष्परिणाम जब सामने आएगा तब ये झूठी मान्यता वाले ये धन, जन (शिष्य-अनुयायीगण) ये महल अट्आलिकाओं वाले आश्रम-प्रचार-प्रसार आदि-आदि कुछ काम नहीं आएँगे तड़पना छटपटाना तो पड़ेगा ही पड़ेगा--- प्रायश्चित मात्र से काम नहीं चल पाएगा । झूठी करनी-झूठी मान्यता का लाभ आप लोग लेंगे तो दण्ड रूप दुष्परिणाम कौन झेलेगा ? आप लोग-सिर्फ आप लोग ही । यह आप सभी को डरा-धमका नहीं रहा हूँ बल्कि सचेत कर रहा हूँ कि सम्हल जाइए-सम्भल जाइए! अब से झूठी मान्यतायें छोड़कर परम सत्य को सहर्ष स्वीकार कर सत्य के ही हो जाइए-हो जाइए-हो ही जाइए । अब देर करने में तड़पना-पछताना ही हाथ लगेगा। सब भगवत् कृपा । 

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पुरुषोत्तम धाम आश्रम
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